Sanskrit shlok Arth

Saturday, June 19, 2021

यदा न कुरुते पापं सर्वभूतेषु कर्हिचित् श्लोक का अर्थ


 

यदा न कुरुते पापं सर्वभूतेषु कर्हिचित्। 

कर्मणा मनसा वाचा ब्रह्म सम्पद्यते तदा।।


जब कर्म, मन और वाणी से पुरुष सभी प्राणियों के प्रति कोई पाप नहीं करता, तब वह ब्रह्म को प्राप्त कर लेता है।


#महाभारत, आदिपर्व 16.52 

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अंतर्राष्ट्रीय योगा दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।

योग: कर्मसु कौशलम्।। 

अर्थ- “कर्म में कुशलता ही योग है”।
 

Yogaday (योग दिवस) image

 


अंतर्राष्ट्रीय योगदिवस की आपको हार्दिक शुभकामनाएं।

योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः। 

अर्थ: चित्तवृत्तियों का निरोध योग है।

Friday, June 18, 2021

*न कुलं वृत्तहीनस्य* *प्रमाणमिति में मतिः श्लोक का अर्थ


 *न कुलं वृत्तहीनस्य*

*प्रमाणमिति में मतिः।*

*अन्तेष्वपि हि जातानां*

*वृत्तमेव विशिष्यते॥*


अर्थात - ऊँचे या नीचे कुल से मनुष्य की पहचान नहीं हो सकती। मनुष्य की पहचान उसके सदाचार से होती है, भले ही वह नीच कुल में क्यों न पैदा हुआ हो।


*🙏💐🌻मङ्गलं सुप्रभातम्🌻💐🙏*

Wednesday, June 16, 2021

शीलं प्रधानं पुरुषे तद् यस्येह प्रणश्यति श्लोक का अर्थ


 

*शीलं प्रधानं पुरुषे तद् यस्येह प्रणश्यति।*

*न तस्य जीवितेनार्थो न धनेन न बन्धुभिः॥*

अर्थात - शील ही मनुष्य का प्रमुख गुण है। जिस व्यक्ति का शील नष्ट हो जाता है - धन, जीवन और सगे-सम्बन्धी उसके किसी काम के नहीं रहते; अर्थात उसका जीवन व्यर्थ हो जाता है।

*मङ्गलं सुप्रभातम्*

दुःखाभ्रराशेरनिशं ह्यवावास्यं वीक्ष्य मे तल्लपने विजावा श्लोक का अर्थ


 

दुःखाभ्रराशेरनिशं ह्यवावास्यं वीक्ष्य मे तल्लपने विजावा। 

कोपप्रशान् कामदुघस्सुहासः शंस्थाः प्रतान्मे नितरां प्रियायाः।। 


    मेरी प्रिया का सुहास नित्य दुःखस्य के बादलो को हटाने वाला, सदा मेरा मुख देखकर उस के मुख पर विशेष रूप से उत्पन्न होने वाला, मेरे क्रोध का शमन करनेवाला, अभीष्ट चीज देनेवाला, मुझे सुख पूर्वक रखनेवाला, और उसे बढानेवाला हैं। 


वनेऽपि सिंहा मृगमांसभक्ष्याः बुभुक्षिता नैव तृणं चरन्ति श्लोक का अर्थ

 


वनेऽपि सिंहा मृगमांसभक्ष्याः बुभुक्षिता नैव तृणं चरन्ति।

एवं कुलीना व्यसनाभिभूताः न नीतिमार्गं परिलङ्घयन्ति॥


अर्थात् जैसे वन में पशुओं के मांस को खाने वाले शेर भुख लगने पर भी घास नहीं खाते वैसे ही कुलीन व्यक्ति विपत्ति से परेशान होकर भी नैतिक पथ का उल्लङ्घन नहीं करते हैं अर्थात् उचितानुचित के विचार का त्याग नहीं करते।

संस्कृत श्लोक

धनतेरस की शुभकामनाएं

  ॐ नमो भगवते महासुदर्शनाय वासुदेवाय धन्वंतराये:। अमृतकलश हस्ताय सर्व भयविनाशाय सर्व रोगनिवारणाय।। आप सभी को धनतेरस पर्व की हार्दिक शुभकामना...